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उमा सीरीज (Uma Series)एक धार्मिक संगीत (Devotional Music) कम्पनी है | ब्रज प्रदेश एवं श्री राधाकृष्ण की नित्य क्रीड़ास्थली श्री धाम वृन्दावन में दिनांक १ जनवरी २०१२ को इसका निर्माण हुआ | ब्रज संस्कृति एवं ब्रज के पुरातन शास्त्रीय संगीत की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए | सनातन धर्म के प्रचार प्रसार एवं सभी वैष्णव भक्तों के श्रवणार्थ ,भजन ,कीर्तन श्लोक चोपाई स्तुति आदि की संगीतमय रचना कर। ब्रज के रसिको, संतों, कथाकारों ,एवं भजन गायकों की मधुर आवाज में “यू ट्यूब एवं सोशल मीडिया” के माध्यम से आप सभी को श्रवण कराती है संगीत सम्राट स्वामी श्री हरिदास जी की तपोस्थली एवं संतों,रसिकों,सुप्रसिद्ध संगीतकारों की भूमि श्री धाम वृन्दावन में उमा सीरीज(Uma series Devotional Music CO.) भक्ति संगीत कम्पनी के द्वारा बनाया गया संगीत, मर्यादित एवं भक्तों की भावना को ध्यान में रखते हुए | सुप्रसिद्ध संगीत कलाकारों के द्वारा बनाया जाता है |

भक्तिसंगीत एवं ब्रजसंगीत का पुरातन काल :

भारत के सांस्कृतिक जीवन में काव्य और संगीत का विशेष स्थान है। यदि उपासना भारतीय जीवन का अभिन्न अंग है, तो काव्य और संगीत उपासना के अभिन्न अंग हैं।तथापि यह कहा जा सकता है कि जहाँ वेदमंत्रों में उदात्त- अनुदात्त स्वरित रुप से भारत के प्राचीनतम साहित्य में संगीत के स्वर जगते हैं। यही नहीं श्रीकृष्ण- कथित “वेदानां सामवेदोsस्मि’ के उदघोष में भी सामवेद का सांगीतिक महत्व प्रखर हुआ है तथा बाद में भी आदिकाव्य रामायण से पुराण, संस्कृत और पालि साहित्य तक काव्य- संगीत उपासना का ही अंचल पकड़ कर सामने आए हैं,इस युग में ( १४- १५- १६ वीं शताब्दी- मध्यकालीन भक्ति आंदोलन )

ब्रज के संगीतकार:

भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के स्वर्णिम अध्याय के पृष्ठों पर ब्रजी काव्य के उदय- अभ्युदय के इतिवृत को अग्रसारित किया।सूरदास, परमानंददास, कुंभनदास, कृष्णदास नंददास, चतुर्भुजदास, गोविंदस्वामी और छीतस्वामी को मिलाकर, इन आठ महान कीर्तनकारों को अष्टछाप के रुप में इन उत्सों से नि:सृत भक्ति- संगीत की भावधारा सहस्रों स्रोतों से स्फुरित लघु- दीर्घ धाराओं को अपने में समाहित कर प्रवाहित हुई, जिसने सारे देश को “स्यामरस मज्जित’ पावन किया। मानव जीवन की समस्त सौंदर्य भावना अष्टछाप के संगीत में साकार हो गई। क्योंकि ये आठों कीर्तनकार महान कवि होने के साथ उच्चकोटि के गायक भी थे। गोविंदस्वामी तो संगीत के जाने- माने आचार्य थे।तानसेन ने भी धमार गायकी गोविंदस्वामी से ही सीखी थी।ब्रजी काव्य- संगीत की इस प्रगति गाथा में दूसरा महत्वपूर्ण नाम संगीतावतार स्वामी श्री हरिदासजी का है। संगीत उनकी भी उपासना था, क्योंकि स्वामीजी के अनुसार राग- रंग में ही श्यामा- श्याम का नित्यनिवास है, नादसिंधु के मंथन करने पर ही उन्हें निरखा जा सकता है –

राग- रागिनी अलौकिक उपजत,
नृत्य संगीत अलग लाग लागे।
राग ही में रंग रह्यौ,
रंग के समुद्र में ए दोउ झागे।।

— केलिमाल

इस प्रकार हरिदासजी ने संगीत को उपासना के उस स्तर पर प्रतिष्ठित किया जहाँ वह श्यामाश्याम के निकुँज- दरबार की शोभा बना। स्वामीजी ने विदेशी तत्व मिश्रित भारतीय संगीत का परिष्कार कर ध्रुव- पद की सात्विक शास्रीय विधि को निखारा, जिसके कारण संगीत सम्राट तानसेन भी इनकी शरण में आया। तानसेन के अतिरिक्त गोपाललाल, मदनराय, दिवाकर पंडित, सोमनाथ और राजा सौरसेन भी इनक संगीत शिष्य थे।इस प्रसंग में गौड़ीय संप्रदाय- विधायक चैतन्य महाप्रभु एवं उनके शिष्य रुप और सनातन के अतिरिक्त राधावल्लभ संप्रदाय प्रवर्तक हित हरिवंश का नाम भी नमनीय है, जिन्होंने वृंदावन को केंद्र बनाकर कीर्तन भक्ति का प्रसार किया।

ब्रजसंगीत की लोकप्रियता :

संगीत के रथ पर चढ़कर ब्रजी गुजरात से बंगाज, पंजाब से महाराष्ट्र और काठियावाड़ से कच्छ तक प्रचलित हुई। समग्र राष्ट्र ब्रजी के मधुमय स्वरों की ओर एक चित्त से आकृष्ट था। इन भक्त- कवियों की ब्रजी- रस पगी वाणी देश के कोने- कोने में गूँजने लगी, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता उसके संगीत में निहित थी। ब्रजी के भक्तिगीतों के साथ जितना रगमगा बना उतना संभवतः संगीत अन्य किसी भाषा के साथ नहीं। यही कारण है कि यदि ब्रजी की भक्ति काव्यधारा को संगीत की दृष्टि से ओझल कर नहीं समझा जा सकता, तो उत्तर भारत के शास्रीय संगीत पर जो कुछ भी “नदीदी कौ धन’ है, वह ब्रजी की ही धरोहर है। इसका एक कारण यह भी है कि भक्तिकाल के सभी कवि प्रायः संगीतज्ञ थे तथा सभी गायक कवि। अतएव भक्तिकाव्य में संगीत के प्रभूत तत्व उपलब्ध होते हैं।

बरनन को करि सकै अहो तिहिं भासा कोटी।
मचलि मचलि मांगी हरि जामैं माखन रोटी।।

ब्रजसंगीत एवं भक्ति संगीत में रागों का महत्वपूर्ण स्थान:

ब्रजी को “पुरुषोत्तम भाषा’ की संज्ञा दी। अतएव “हमारी ब्रजबानी ही बेद’ बनकर वह कृष्णभक्त कवियों की रसना पर थिरकी। कृष्णभक्त कवियों की रसना पर थिरकी। कृष्णभक्त कवियों ने भी अपनी वाणी की सार्थकता तब तक न मानी, जब तक कि श्रीकृष्ण की ब्रजभाषा में कुछ आत्म निवेदन न कर लिया। यही कारण था कि भक्ति आंदोलन के रंगमंच पर संख्या से परे भक्त कीर्तनकार आए, जिनका लेखा जोख रखना ा,सपस असज इतिहास को भी दूभर हो गया। प्रमुख हैं — हरिराय, हरिराम व्यास, काका वल्लभजी, ब्रजाधीश गंगाबाई ( बिट्ठल गिरिधरन ), कल्याण, व्यासदास, मानदास, दामोदरहित, श्रीभट्ट, अग्रदास, माधुरीदास, मुकुंद प्रभु, मेहा, धौंधी, रघुनंदन, रसखान, रसिक, रुपमाधुरी, रसिक बिहारी, रामराय, बिट्ठलदास, बिट्ठविपिन बिहारी, बिट्ठल विपुल, विष्णुदास, वृंदावन, बिंदाबनहित भूषण, सूरदास मदन मोहन, जनहरिया, हितहरिवंश, मीरा, हरिव्यास देव, रुप रसिक देव, परशुराम, ब्रजदासी, सुदर कुंवरि, तत्ववेत्ता, बिहारिन देव, सरसदेव, नरहरिदेव, पीतांबर देव, सहचरिशरण, गदाधर, गिरिधर, गोकुलनाथ गोवर्धनेश, घनश्याम प्रभु, चतुर बिहारी, जगतानंद, जयभगवान, जुगल, ताज दयाराम भाई, द्वारकेश, नवलसखी, नागरीदास, पुरुषोत्तम प्रभु, प्रान जीवन, बालकृष्ण, मथुरानाथ, अलीखान, अलीदीन, आसकरण, आनंदघन, इच्छाराम, कटहरिया, कल्याण कान्हर, किशोरीदास, कुंजबिहारी, कृष्णकमल, कृष्णजीवन, लच्छीराम, कृष्णदास, गगरीगंग, गंगग्वाल आदि- आदि….।कृष्णभक्त कवि रागों के अच्छे ज्ञाता थे। भारतीय संगीत शास्र में रागों के भाव, ॠतु व समय का वर्गीकरण किया गया है, जिसे इन कीर्तनकारों ने पग- पग पर निभाया है। विनय के पदों में जहाँ बिलावल, कान्हड़ा, धनाश्री, रामकली, नट, केदार, सारंग, मल्हार, परज, और विहागरौ सोरठ, आसावरी, देवगंधार, टोड़ी झिंझोटी, गौरी, खंबावती तथा मुलतानी आदि दैन्य एवं विनय भावप्रधान रागों का प्रयोग है, वहीं करुण प्रसंगों में केदार और गुनकली, श्रृंगार भावना में मालकोंस और हमीर, हर्षोल्लास- विनोद के प्रसंगों में काफी, जैतश्री, जैजैवंती, कान्हरौ, ललित गौडमलार, नट, भैरव, पूर्वी, वसंत और सारंग एवं वीरता के प्रसंगों में मारु राग की भावानुकूल सुखद जूरी मिली है।

भक्ति संगीत में समय और ॠतु- सिद्धांत का निर्वाह भी बखूबी हुआ है। पुष्टिमार्गीय सेवाक्रम में आठ झांकियाँ होती है — मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या- आरती और शयन। इन कवियों ने इन झांकी- प्रसंगों के पदों में संगीत के शास्रीय समय विधान का समन्वय किया है। मंगला प्रसंग में संधिप्रकाश रागों — विभास, रामकली, ललित, भैरव आदि का प्रयोग है तो कलेऊ ( सूर्योदय उपरांत ) में आसावरी और बिलावल, गोचारण, राजभोग तथा छाक प्रसंगों में सारंग तथा खंडिता प्रसंगों में अधिकतर रात्रि में गाए जाने वाले करुण रागों का प्रयोग किया हे। इतना ही नहीं यह सब क्रम ॠतुओं के अनुसार है, उदाहरणार्थ, होली के बाद ग्रीष्म की संधि में विभास, खट, भैरव आदि ठंडे राग गाएँगे तो शिशिर में रामकली, ललित आदि उष्ण प्रकृति के राग। वर्षा में मल्हार के विविध रुप आएँगे तो वसंत ॠतु में वसंत एवं होली में उल्लासमय काफी राग।

इस प्रकार ब्रजी काव्य और संगीत का संबंध आज नहीं सदियों पुराना होने के कारण एक रुप है। संगीत के पास जो कुछ वैभव है वह ब्रजी की धरोहर ही तो है। ब्रजी काव्य ने भी संगीत के ही द्वारा यह गौरव प्राप्त किया है। संगीत को जाने बिना ब्रजी काव्य के सच्चे इतिहास को नहीं जाना जा सकता। वहीं ब्रजी काव्य उसका जीवन- धन है। उसके शास्र ग्रंथ उसका अंग- रुप- रंग ब्रजी का ही है। जितनी चीजें हैं वे सभी ब्रजी में ही है। ये बात दूसरी है कि आज उस क्षेत्र में रचनाएँ बंद हैं, पर जो कुछ पुराना है आप उसी को गाते सुनेंगे। अतः ब्रजी को संगीत की भाषा कहें तो अत्युक्ति न होगी।

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